जब देवताओं का स्वर्ग छिन गया, तब उन्हें पहली बार अपनी शक्ति की सीमा का एहसास हुआ। जिस असुर को वे कभी केवल एक शत्रु समझते थे, वही अब तीनों लोकों की व्यवस्था को चुनौती दे रहा था। लेकिन इस संकट के बीच एक ऐसी शक्ति जन्म लेने वाली थी, जो किसी एक देवता की नहीं थी। वह शक्ति अनेक देवताओं के तेज से बनेगी। और उसका नाम होगा — देवी।

[खण्ड क]

जब महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर दिया

महिषासुर ने घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा उसके सामने प्रकट हुए। महिषासुर ने ऐसा वर माँगा कि देवता या पुरुष उसका वध न कर सके। उसे विश्वास था कि इस वरदान के बाद उसे कोई पराजित नहीं कर पाएगा। वरदान पाकर उसका अहंकार बढ़ गया। उसने अपनी विशाल सेना के साथ देवताओं पर आक्रमण किया। युद्ध आरंभ हुआ और लंबे संघर्ष के बाद देवताओं की सेना पराजित हो गई। महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और स्वयं इंद्र का स्थान ग्रहण कर लिया। देवीमाहात्म्य के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच यह युद्ध सौ वर्षों तक चला, जिसके बाद महिषासुर देवताओं का स्वामी बन बैठा। देवताओं से उनके अधिकार छिन गए। सूर्य, इंद्र, अग्नि, वायु, चंद्र और अन्य देवताओं के अधिकार भी महिषासुर ने अपने अधीन कर लिए। स्वर्ग में अब देवताओं का शासन नहीं था। चारों ओर महिषासुर की सत्ता फैल चुकी थी।

[खण्ड ख]
[खण्ड क]

जब देवताओं के सामने कोई उपाय नहीं बचा

पराजित देवता एकत्र हुए। ब्रह्मा को आगे करके वे विष्णु और शिव के पास पहुँचे। उनके चेहरे पर पराजय थी और सामने एक ऐसा शत्रु था, जिसे वे अपनी शक्ति से रोक नहीं पाए थे। देवताओं ने अपनी पूरी व्यथा सुनाई। उन्होंने बताया कि महिषासुर ने उनका स्वर्ग छीन लिया है। उसने उनके अधिकार अपने हाथ में ले लिए हैं। अब उनके पास अपना लोक वापस पाने का कोई उपाय नहीं बचा था। उनकी बात सुनकर विष्णु और शिव के भीतर क्रोध प्रकट हुआ। अन्य देवताओं के भीतर भी वही क्रोध उमड़ पड़ा। वह क्रोध धीरे-धीरे तेज में बदलने लगा और सभी दिशाओं से दिव्य प्रकाश निकलकर एक ही स्थान पर एकत्र होने लगा।

[खण्ड ग]

जब देवताओं का तेज एक शक्ति बन गया

शिव, विष्णु और ब्रह्मा से निकला तेज एक विशाल प्रकाश-पुंज में बदल गया। फिर अन्य देवताओं का तेज भी उसी में समाने लगा। वह प्रकाश इतना प्रचंड था कि दिशाएँ जैसे उसके भीतर विलीन होने लगीं। उस तेज से धीरे-धीरे एक दिव्य स्त्री का स्वरूप प्रकट हुआ। उनके मुख पर शिव का तेज था। उनके केश यम के तेज से, भुजाएँ विष्णु के तेज से और चरण ब्रह्मा के तेज से प्रकट हुए। उनके पूरे स्वरूप में देवताओं की शक्तियाँ एक साथ दिखाई देने लगीं। देवता उस अद्भुत स्वरूप को देखते रह गए। जिस समय वे स्वयं महिषासुर के सामने असहाय हो चुके थे, उसी समय उनके सम्मिलित तेज से एक नई शक्ति जन्म ले चुकी थी। वह कोई साधारण देवी नहीं थीं। वह उन सभी शक्तियों का एकीकृत स्वरूप थीं।

[खण्ड घ]

जब देवी को देवताओं के अस्त्र मिले

देवी के प्रकट होते ही देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र और आभूषण प्रदान किए। शिव ने अपने त्रिशूल से एक और त्रिशूल उत्पन्न करके उन्हें दिया। विष्णु ने अपने चक्र से दूसरा चक्र प्रदान किया। वरुण ने शंख दिया और अग्नि ने शक्ति प्रदान की। वायु ने धनुष और दो बाण-भरे तरकश दिए। इंद्र ने अपने वज्र से एक वज्र उत्पन्न करके उन्हें सौंपा। यम ने दंड दिया और वरुण ने पाश प्रदान किया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी अपनी शक्तियों के प्रतीक उन्हें अर्पित किए। अब देवी का स्वरूप और भी विराट हो चुका था। उनके अनेक हाथों में अनेक अस्त्र चमक रहे थे। हर अस्त्र अपने साथ किसी देवता की शक्ति लेकर आया था। देवताओं की जो शक्तियाँ अब तक अलग-अलग थीं, वे एक ही स्वरूप में एकत्र हो चुकी थीं।

[खण्ड ङ]

जब देवी की गर्जना से तीनों लोक कांप उठे

देवी ने जब अपनी पूरी शक्ति के साथ गर्जना की, तो उसका प्रभाव केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहा। आकाश कांप उठा। पृथ्वी हिलने लगी और समुद्रों में हलचल मच गई। उनकी गर्जना की प्रतिध्वनि तीनों लोकों में फैल गई। देवताओं के भीतर आनंद उमड़ पड़ा। उन्हें लगा कि उनकी पराजय का अंत अब निकट है। उन्होंने देवी की विजय की कामना की। दूसरी ओर असुरों की सेना उस गर्जना से विचलित होने के बजाय युद्ध के लिए तैयार होने लगी। महिषासुर ने भी उस गर्जना को सुना। उसके सामने अब वही शक्ति खड़ी थी, जिसे देवताओं ने अपने संयुक्त तेज से जन्म दिया था। युद्ध अब टलने वाला नहीं था।

[खण्ड च]

जब देवी और महिषासुर आमने-सामने आए

महिषासुर ने अपनी विशाल सेना को युद्ध के लिए भेज दिया। उसके सेनापति और असंख्य असुर अस्त्र-शस्त्र लेकर देवी की ओर बढ़े। उनके सामने सिंह पर आरूढ़ देवी खड़ी थीं, जिनके हाथों में देवताओं द्वारा दिए गए दिव्य अस्त्र चमक रहे थे। युद्ध आरंभ हुआ। असुरों की सेनाएँ चारों ओर से टूट पड़ीं और देवी ने भी अपने अस्त्र उठा लिए। सिंह गर्जता हुआ शत्रुओं के बीच जा पहुँचा और देखते ही देखते युद्धभूमि अस्त्रों, गर्जनाओं और युद्धघोष से भर गई। देवीमाहात्म्य के अगले वर्णनों में चिक्षुर, चामर, महाहनु, बाष्कल और अन्य असुर सेनापतियों के साथ देवी के भीषण युद्ध का विस्तार आता है। लेकिन यह तो केवल आरंभ था। महिषासुर स्वयं अभी युद्धभूमि में अपनी पूरी शक्ति के साथ नहीं उतरा था। जिस शक्ति के सामने उसकी पूरी सेना खड़ी थी, उसका सामना अब स्वयं महिषासुर को करना था। और वह युद्ध केवल दो योद्धाओं का युद्ध नहीं था। यह अहंकार और शक्ति के बीच होने वाला वह संघर्ष था, जिसकी गूंज आने वाली सदियों तक नवरात्रि की रातों में सुनाई देगी। कथा अभी बाकी है।

Privacy Preference Center