• वाल्मीकि रामायण > युद्ध कांड

श्री राम लंका विजय के बाद अपने स्वर्णिम धनुष के साथ विजयी मुद्रा में खड़े हैं
अयोध्या के आकाश में आता दिव्य पुष्पक विमान और नीचे अश्रुपूरित नेत्रों से स्वागत करते राजकुमार भरत
कार्तिक अमावस्या की काली रात में सरयू नदी के तट पर जगमगाते मिट्टी के दीये
दीपों और गेंदे के फूलों से सजी अयोध्या की सड़कों पर श्री राम और माता सीता पर पुष्प वर्षा करती प्रजा
गुरु वशिष्ठ द्वारा स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान भगवान श्री राम का राज्याभिषेक
एक विशाल जलते हुए दीपक की ज्योति में भगवान श्री राम की दिव्य आभा का प्रकटीकरण

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भक्तों के मुख्य प्रश्न

विभीषण ने धर्म और सत्य का साथ देने के लिए रावण को छोड़ा, क्योंकि रावण ने न केवल अधर्म किया था, बल्कि समझाने पर अपने भाई का घोर अपमान भी किया था।

रावण ने भरी सभा में विभीषण को लात मारकर अपमानित किया और उन्हें देश निकाला दे दिया था।

विभीषण के साथ उनके चार अत्यंत निष्ठावान मंत्री भी आकाश मार्ग से श्री राम की शरण में आए थे।

शुरुआत में सुग्रीव और अन्य वानर विभीषण पर संदेह कर रहे थे और उन्हें बंदी बनाने की सलाह दे रहे थे, किंतु श्री राम ने उनकी बात नहीं मानी।

यह कथा सिखाती है कि व्यक्ति को कुल या परिवार से ऊपर उठकर सदैव धर्म और सत्य का चुनाव करना चाहिए। विभीषण की शरणागति सिद्ध करती है कि ईश्वर की शरण में जाने पर व्यक्ति का कल्याण निश्चित है।

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