- श्रीमद्भागवत पुराण > अष्टम स्कंध > अध्याय 7
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देवासुर संग्राम के बीच अमृत प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन एक निर्णायक मोड़ था। यह कथा केवल रत्नों की प्राप्ति नहीं, बल्कि विनाशकारी विष के शोधन और महादेव के त्याग की गाथा है। यह क्षीर सागर की गहराइयों से उभरा एक ऐसा रहस्य है जिसने ब्रह्मांड की नियति तय की।
अमृत की खोज में प्रलयंकारी बाधा
जब मंदराचल पर्वत और वासुकी नाग के सहयोग से मंथन प्रारंभ हुआ, तब अमृत से पूर्व 'हलाहल' नामक भीषण विष प्रकट हुआ। इसकी प्रलयंकारी ज्वाला ने तीनों लोकों को भस्म करना शुरू कर दिया, जिससे देव और असुर भयभीत होकर पीछे हटने लगे।
विष की तपिश इतनी तीव्र थी कि सृष्टि का अंत निकट दिखने लगा। ब्रह्मा और विष्णु भी इस संकट का समाधान खोजने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। दसों दिशाओं में कालिख और काला धुआँ फैल गया, और समस्त जीवन की डोर टूटने के कगार पर पहुँच गई।
विष की तपिश इतनी तीव्र थी कि सृष्टि का अंत निकट दिखने लगा। ब्रह्मा और विष्णु भी इस संकट का समाधान खोजने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। दसों दिशाओं में कालिख और काला धुआँ फैल गया, और समस्त जीवन की डोर टूटने के कगार पर पहुँच गई।
संकट को भयावह देख समस्त देवगण कैलाश की ओर दौड़े। महादेव अपनी समाधि में लीन थे। जब उन्हें सृष्टि के आसन्न विनाश की सूचना मिली, तब उन्होंने करुणावश उस विष को स्वयं ग्रहण कर ब्रह्मांड को बचाने का महान निर्णय लिया।
महादेव ने विष की अंजलि भरी और उसे पीने लगे। जैसे ही विष उनके गले तक पहुँचा, माता पार्वती ने उनके कंठ को थाम लिया। वह विष न नीचे उतरा और न बाहर निकला। इस युगल शक्ति ने प्रलय को शिव के गले में ही रोक दिया।
विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। संपूर्ण वातावरण की नकारात्मकता और काली छाया समाप्त हो गई। शिव के इस शांत किंतु ओजस्वी स्वरूप ने मंथन के भय को पुनः उत्साह और आशा में बदल दिया।
नीलकंठ का उदय और शुभत्व का आगमन
जैसे ही विष का संकट टला, समुद्र मंथन की दिशा पूरी तरह बदल गई। अब समुद्र से ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष और साक्षात माता लक्ष्मी जैसे दिव्य रत्न निकलने लगे। विनाश का जो मार्ग खुला था, वह अब सृजन और समृद्धि की ओर मुड़ चुका था।
यह कथा सिखाती है कि जीवन के मंथन में सुख से पहले कड़वाहट को स्वीकारना पड़ता है। महादेव का नीलकंठ स्वरूप हमें विषमताओं को अपने भीतर संयमित करने की शक्ति प्रदान करता है। मंथन तभी सफल होता है जब हृदय में जगत-कल्याण की भावना हो।









