• वाल्मीकि रामायण > युद्ध कांड

रामायण की गाथा में विभीषण का चरित्र धर्म और नैतिकता के संघर्ष का अनुपम उदाहरण है। जब लंका पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, तब विभीषण ने वह कठिन मार्ग चुना जिसे आज हम विभीषण की शरणागति के रूप में जानते हैं। यह कहानी केवल एक भाई के त्याग की नहीं, बल्कि सत्य के लिए अपने कुल और वैभव को त्यागने की महान यात्रा है।


लंका की राजसभा में धर्म का पक्ष

लंका की वह रात अत्यंत भारी थी। रावण की राजसभा में युद्ध की तैयारियाँ चल रही थीं, तब विभीषण ने बड़े साहस के साथ अपने भाई को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने हाथ जोड़कर रावण से प्रार्थना की कि वे माता सीता को ससम्मान श्री राम को लौटा दें और व्यर्थ के विनाश को रोकें।

विभीषण की न्यायपूर्ण वाणी सुनकर रावण क्रोध से लाल हो गया। उसने अपने छोटे भाई को कायर और कुलद्रोही कहते हुए अपमानित किया। अहंकार में डूबे रावण ने विभीषण को लात मारकर सभा से निकाल दिया। यह वह क्षण था जब विभीषण ने समझ लिया कि अधर्म के साथ रहना स्वयं अधर्मी होना है।

अधर्म का त्याग और समुद्र पार गमन

अपमानित विभीषण ने तुरंत लंका छोड़ने का निर्णय लिया। वे अपने चार निष्ठावान मंत्रियों के साथ आकाश मार्ग से विशाल समुद्र को पार कर श्री राम के शिविर की ओर बढ़ चले। उनके मन में भय नहीं, बल्कि सत्य की शरण पाने की एक गहरी तड़प थी, जो उन्हें प्रभु के निकट ले जा रही थी।

जब विभीषण समुद्र के इस पार वानर सेना के निकट पहुँचे, तो हर ओर संदेह फैल गया। सुग्रीव और अन्य वानर वीरों को लगा कि यह रावण का कोई गुप्तचर है। किंतु विभीषण अडिग रहे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक संदेश भेजा कि वे लंका के राजकुमार हैं और श्री राम के चरणों में अपना जीवन समर्पित करने आए हैं।

श्री राम का अभय दान और राज्याभिषेक

प्रभु श्री राम ने मुस्कुराते हुए घोषणा की कि जो भी एक बार उनकी शरण में आकर कहता है 'मैं तुम्हारा हूँ', उसे वे सदैव के लिए अभय कर देते हैं। उन्होंने विभीषण का स्वागत एक शत्रु के भाई के रूप में नहीं, बल्कि एक परम भक्त के रूप में किया। राम की करुणा ने विभीषण के सभी दुखों को हर लिया।

उसी क्षण श्री राम ने लक्ष्मण से समुद्र का जल मंगवाया और रणभूमि में ही विभीषण का लंका के राजा के रूप में तिलक कर दिया। यह शरणागति का वह फल था जिसने सिद्ध किया कि जो धर्म के साथ खड़ा होता है, भगवान स्वयं उसके सम्मान की रक्षा करते हैं। विभीषण अब श्री राम के अभिन्न साथी बन चुके थे।

भक्तों के मुख्य प्रश्न

विभीषण ने धर्म और सत्य का साथ देने के लिए रावण को छोड़ा, क्योंकि रावण ने न केवल अधर्म किया था, बल्कि समझाने पर अपने भाई का घोर अपमान भी किया था।

रावण ने भरी सभा में विभीषण को लात मारकर अपमानित किया और उन्हें देश निकाला दे दिया था।

विभीषण के साथ उनके चार अत्यंत निष्ठावान मंत्री भी आकाश मार्ग से श्री राम की शरण में आए थे।

शुरुआत में सुग्रीव और अन्य वानर विभीषण पर संदेह कर रहे थे और उन्हें बंदी बनाने की सलाह दे रहे थे, किंतु श्री राम ने उनकी बात नहीं मानी।

यह कथा सिखाती है कि व्यक्ति को कुल या परिवार से ऊपर उठकर सदैव धर्म और सत्य का चुनाव करना चाहिए। विभीषण की शरणागति सिद्ध करती है कि ईश्वर की शरण में जाने पर व्यक्ति का कल्याण निश्चित है।

विभीषण ने धर्म और सत्य का साथ देने के लिए रावण को छोड़ा, क्योंकि रावण ने न केवल अधर्म किया था, बल्कि समझाने पर अपने भाई का घोर अपमान भी किया था।

रावण ने भरी सभा में विभीषण को लात मारकर अपमानित किया और उन्हें देश निकाला दे दिया था।

विभीषण के साथ उनके चार अत्यंत निष्ठावान मंत्री भी आकाश मार्ग से श्री राम की शरण में आए थे।

शुरुआत में सुग्रीव और अन्य वानर विभीषण पर संदेह कर रहे थे और उन्हें बंदी बनाने की सलाह दे रहे थे, किंतु श्री राम ने उनकी बात नहीं मानी।

यह कथा सिखाती है कि व्यक्ति को कुल या परिवार से ऊपर उठकर सदैव धर्म और सत्य का चुनाव करना चाहिए। विभीषण की शरणागति सिद्ध करती है कि ईश्वर की शरण में जाने पर व्यक्ति का कल्याण निश्चित है।

Privacy Preference Center